BIG NEWS : पीङिता परिवार व अन्य को गलत मैसेज भेजने का आरोप

 NEWS EPISODE : 22/282

         BIG BREAKING NEWS

                  22 मई के मुख्य समाचार

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🔸म्यांमार के 5,600 से अधिक शरणार्थियों ने मिजोरम में शरण ली

🔸लाल किला हिंसा मामले में अभिनेता दीप सिद्धू सहित 16 के खिलाफ आरोपपत्र दायर

🔸सुप्रीम कोर्ट ने YSR कांग्रेस के बागी सांसद कृष्ण राजू को दी जमानत, आंध्र सरकार को झटका

🔸नारद स्टिंग मामला : गिरफ्तार चारों नेताओं को नजरबंदी में भेजने का आदेश, बड़ी पीठ का गठन

🔸पाकिस्तान में फलस्तीन के समर्थन में रैली के दौरान विस्फोट, 7 लोगों की मौत, 13 घायल

🔸कोरोना काल में मोदी सरकार का बड़ा तोहफा, डेढ़ करोड़ कर्मचारियों का बढ़ाया मंहगाई भत्ता

🔸विदेश मंत्री जयशंकर का बड़ा बयान- चौराहे पर खड़ा है भारत-चीन का रिश्ता

🔸कोरोना से होने वाली मौतों पर बोला WHO, संख्या बहुत कम बताई गई, हकीकत में दोगुने हो सकते हैं आंकड़े

🔸एयर इंडिया के लाखों यात्रियों का डेटा चोरी, एयरलाइन्स के सर्वर पर साइबर अटैक

🔸इलाहाबाद हाई कोर्ट के 'राम भरोसे' वाले आदेश पर SC ने लगाई रोक, कहा- ऐसे निर्देश न दें जो लागू न हो सके

🔸'टूलकिट' ट्वीट पर ऐक्शन तो मैदान में आई सरकार, संबित पात्रा बोले- ट्विटर खुद वामपंथी है

🔸ना कोविड हुआ, ना स्टेरॉयड लिया फिर भी बना ब्लैक फंगस का शिकार!

🔸ब्लैक फंगस का राजस्थान की गहलोत सरकार मुफ्त में कराएगी इलाज

🔸बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं ब्लैक फंगस के मामले, स्वास्थ्य सचिव ने एहतियात बरतने के दिए निर्देश

🔸कोरोना से अनाथ हुए बच्चों- महिलाओं का रखें विशेष ध्यान, गृह मंत्रालय का राज्य सरकारों को निर्देश

🔸SBI Ecowrap Report: 19 राज्यों में लागू लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को होगा 5.5 लाख करोड़ का नुकसान

🔸कोरोना में जान गंवाने वालों को याद करते समय भावुक हुए PM मोदी, कहा-वायरस ने कई प्रियजनों को छीना है

🔸आशाराम बापू को झटकाः हरिद्वार में इलाज कराने की मांगी थी इजाजत, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

🔸कोरोना की स्वदेशी किट:DRDO ने बनाई कोरोना एंटीबाॅडी टेस्टिंग किट, 75 रुपए के खर्च पर 75 मिनट में मिलेगी जांच रिपोर्ट

🔸कृषि कानूनों पर सुलह की कोशिश:संयुक्त किसान मोर्चा ने PM मोदी से फिर बातचीत शुरू करने की अपील की, 26 मई से विरोध तेज करेंगे

🔹भारतीय टीम के दौरे से पहले श्रीलंका क्रिकेट में आया भूचाल, बोर्ड के खिलाफ उतरे खिलाड़ी, सीरीज पर पड़ सकता है असर

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जोधपुर से खबर

ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए सोनू सूद बने देवदूत

ब्लैक फंगस मरीज का एम्स जोधपुर में इलाज जारी, सोनू सूद ने करवाई हैं 10 लिपोसोमल इंजेक्शन की व्यवस्था,मरीज़ के लिये युवा समाजसेवी हितेश जैन ला रहे इंजेक्शन, 2 दिन पहले हितेश जैन के मार्फ़त गंगानगर भी पहुंचाये थे इंजेक्शन।

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जयपुर से खबर

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोरोना के हालातों की समीक्षा के दौरान प्रदेश में लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाने के संकेत दिए, बैठक में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने भी मुख्यमंत्री को संक्रमण को पूरी तरह से रोकने के लिए लॉकडाउन बढ़ाने का सुझाव दिया।

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जोधपुर से खबर

फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाने का आरोप

अकाउंट में प्रार्थी की फोटो डालने का आरोप,परिवार व अन्य को गलत मैसेज भेजने का आरोप,पीड़िता ने रातानाड़ा थाने में दर्ज कराया मुकदमा,नामजद आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज।

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केन्द्रिय मंत्री आयेंगे बाप

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत आधा घंटा बाद पहुंचेंगे बाप

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बाप में व्यवस्थाओं का लेंगे जायजा

फलोदी विधायक पब्बाराम विश्नोई सहित कई पदाधिकारी है साथ

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सीएम लेंगे कोविड रिव्यू मिटिंग

मुख्यमंत्री गहलोत की मीटिंग में बदलाव,अब 1:30 बजे होगी कोविड रिव्यू मीटिंग,उसके बाद होगी मंत्रिपरिषद की बैठक

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मौसम विभाग का अगले दो घंटे के लिए अलर्ट 

तेज हवाओं के साथ हल्की बारिश का किया अलर्ट,बीकानेर और जैसलमेर जिले में किया गया अलर्ट।

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वरिष्ठ पत्रकार कविकान्त खत्री की कलम से खबरें 


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7 राज्यों में ब्लैक फंगस को महामारी घोषित किया ।

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                    मौसम खबर

निचे दिये गये विडियों में 8 दिनों का मॉनसून पूर्वानुमान दिखाया गया हैं जिन्हे रडार के माध्यम से फुटेज ली गई हैं देश के किन - किन भागो धूलभरी आंधी चलेगी तथा किन - किन भागों में बारीष की सम्भावना हैं ।
बंगाल की खाङी से एक ओर भारत के लिये हानि पहुंचाने चक्रवाती तुफान याश बन गया हैं जो 24 मई को बंगाल के तट से टकरायेगा । आगे बढता हुआ  बंगाल, झारखण्ड, बिहार व उतरप्रदेश के पश्चिमी उतरी भागो तक दिनांक 30 मई तक पहुंच जायेगा ।

नोट : राजस्थान के पश्चिमी के कुछ जिलो में 22 व 23 मई को बारीष होने का अनुमान हैं जोधपुर, बिकानेर, फलोदी, बाप में 22 से 23 मई को बारीष की सम्भावना हैं ।
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वेब न्यूज पोर्टल सम्पादक सियाराम विश्नोई जाम्बा

                                         NIC CODE : 63910


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कोटा अनाज मण्डी में बारीष की वजह से किसानो का धान हुआ खराब । मण्डी में किसानों के धान को ठीक से रखने या ठकने का व्यवस्था नही ।


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विश्नोई समाज (20+9)

इतिहास गवाह हैं कि लोदी सम्राज्य से लेकर आजादी 1947 तक, हिन्दुस्थान का एक मात्र विश्नोई ही धर्म ऐसा रहा हैं, जिसको सभी ने सरंक्षण दिया था ।
      राजस्थान का इतिहास बताता हैं कि श्री गुरू जाम्भोजी महाराज का दरबार, समराथल नामक टील्ले पर कभी भी 17 राजाओं व लगभग 3 हजार भग्तगणों की उपस्थिती से संख्या कम नहीं रही थी साथ यही भी लिखा गया हैं कि उस समय एक स्थान पर इतने राजाओं का इक्कठा होना व एक जगह पर साथ रहकर, श्री गुरू जाम्भोजी महाराज की बातों को मनन करना व अमल करना, यह भी एक इतिहास हैं । राजाओं की संख्या उपर में 26 तक रहना, इतिहास में दर्ज हैं ।
      श्री गुरू जाम्भोजी महाराज के कहने पर, अनेक घोर प्रतीद्वंदी रहे राजाओं की समराथल धोरे पर आपस में मेत्री सन्धियां व सम्बन्ध भी स्थापित हुऐ थे । जिसमें से एक मेड़ता (नागौर)के राव दुदा जी की पोत्री भग्त मीरा बाई व चितौड़ के राणा सांगा के पोत्र भोजराज का लग्न (रिस्ता/ मंगनी ) होना । राणा सांगा व राव दुदा के आपसी सम्बन्ध अच्छे नहीं थे मग़र दोनो ही राजा श्री गुरू जाम्भोजी महाराज के परम शिष्य थे । जब भग्त मीरा बाई मात्र आठ वर्ष की थी तब अपने दादा राव दुदा जी के साथ समराथल धोरे पहुंची थी, तब श्री गुरू जाम्भोजी महाराज ने मीरा के सर पर हाथ रखकर आशिर्वाद दिया व दुदा जी से कहां कि यह बच्ची आगे चलकर मैरी बहुत बड़ी भग्त बनेगी व मैरे कृष्ण स्वरूप को प्राप्त करेगी । आप इस बच्ची का विवाह चितौड़ के राणा सांगा के पोत्र भोजराज के साथ कर देना । उधर राणा सांगा भी श्री गुरू जाम्भोजी महाराज की बात कैसे काट सकता था । इस प्रकार से एक-दुसरे के दुश्मन रहे दोनो राजाओं में परिवारिक सम्बन्ध बने ।
      आज यह बात ना तो कौई विश्नोई जानता हैं व ना ही किसी को पता कि सम्पुर्ण विश्व की एक मात्र मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद हैं, जहां पर सभी धर्म के लोग समान रूप से प्रार्थना करने आते हैं मग़र इस बात के सच को कोई नहीं जानता कि इसकी वजह क्या हैं हालांकि यह सभी जानते हैं कि इस मस्जिद का निर्माण, दिल्ली के सम्राट इब्राहिम लोदी व सिकन्दर लोदी (यह दोनों सम्राट पिता-पुत्र थे) ने करवाया था । इस लिऐ आपको जानना जरूरी हैं कि सिकन्दर लोदी व इब्राहिम लोदी, श्री गुरू जाम्भोजी महाराज के परम शिष्य थे जो भगवान श्री जाम्भोजी की बात से प्रभावित होकर, मानव समाज में धर्म, मज़हब के नाम पर होने वाले भेदभाव को खत्म करके, एकता व भाईचारे के लिऐ दिल्ली में एक मस्जिद का निर्माण शुरू करवाया था, जिसका नाम उन्होनें अपने गुरू श्री जाम्भोजी के नाम पर रखा था *जाम्भा मस्जिद* ! जो कालान्तर में आज जामा मस्जिद के नाम से जानी जाती हैं ! आज भी इस मस्जिद पर हिन्दु व मुस्लिम समान रूप से पुजा प्रार्थना करने आते हैं ! मग़र विश्नोई इस बात को नहीं जानता कि हमारा इतिहास क्या था ! 
    अर्थात् मेरे कहने का तात्पर्य यह हैं कि विश्नोई धर्म को आजादी से पहेले सभी राजाओं , सम्राटो व ब्रिटिश शासकों ने सरआँखों पर बिठाकर, सरक्षंण ही नहीं बल्की ईश्वर की तरह पुजा था ! जैसलमेर के राजा जैतसी ने भगवान श्री जाम्भोजी महाराज से अरदास की थी कि मुझे आप सिर्फ दो विश्नोई दे दिजिऐ, जिसके हम लोग दर्शन करेगें, पुजा करेगे ! तब श्री गुरू जाम्भोजी महाराज ने लक्ष्मण गोदारा व पाण्डू गोदारा नामक दो विश्नोई जैसलमेर की सीमा में बसाया था !
       ओर तो ओर, जो लोग आज विश्नोई धर्म की भावनाओं को आहत कर रहे हैं या ठेस पहुंचा रहे हैं , उन्हें मैं बताना चाहुंगा कि देशनोख की करणी माता ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार व समाज से कह दिया था कि मैरा अन्तिम संस्कार (अग्नी दाग) किसी विश्नोई के ही हाथ से करवाना हैं अन्यथा मुझे मोक्ष की प्राप्ती नहीं होगी, क्योंकि आप सब परिवारजन तो सभी मासहारी व जीवों के हत्यारे हो ! यदि मैरी अन्तिम ईच्छा पुर्ण करना चाहते हो तो किसी विश्नोई से ही अन्तिम संस्कार करवा देना, ओर तुम लोग मुझे मृत्युपरान्त हाथ तक मत छुना ! फिर ठीक वैसा ही किया गया था !
    कुल मिलकर हमारा इतिहास बहुत बड़ा हैं , ऐसे लाखों उदाहरण हमारे विश्नोई धर्म के इतिहास में मोजुद हैं । विश्नोई कोम एक क्षत्रिय कोम थी,है व रहोगी ! 
   ओर हम यह भी जानते हैं कि आप क्यों विश्नोई धर्म की भावनाओं को आहत करने में लगे हो ? क्योंकि आपको पहेली बार लोकतंत्र के माध्यम से, स्वंय को सफेद दिखाने का मौका मिला हैं, क्योंकि आपका इतिहास तो किसी से छुपा नहीं हैं ! फिर भी हम तो आप ही की चिन्ता करते हैं कि प्रकृती के बगैर किसी का भी जीवित रहना सम्भव नहीं हैं, इस लिऐ स्वंय के पैर में कुल्हाड़ी मत मारो ! यह वन्यजीव भी प्रकृती का हिस्सा हैं ! इसका भी दर्द समझो मुगलों के सालों, एक तड़फते विश्नोई के हृदय की आवाज !
हम सब कुछ सह लेगें, पर इस बैजुबान, लाचार व मासुम वनचरों को कैसे खत्म होते देखें ? मोदी जी, हमारी कौम को किसी ऐसे टापु पर छुड़वा दो, जहां ऐसे राक्षस ना हो जो वन्यजीव को परेशान करें 

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शब्दवाणी के बजाय;  "साधे-भक्ते ऊधरणों " को ही तरजीह क्यों  ?

समाज हित में भेजा-फ्राई करने वाला अभूतपूर्व  साहसिक विवेचन  

सुधिय बंधुओं,

परशुराम के अर्थ न मुआ* से संबंधित यह व्याख्या परंपरित व्याख्याओं का शब्दांतरण मात्र है!

जैसा आग्रह मैं पहले भी सविनय आग्रह  कर चुका हूँ कि *शब्दवा़णी में परशुराम को (कलमकार ब्राह्मणों  द्वारा) विष्णु का अवतार घोषित करना और उनके आतंकी चरित्र का महिमा-मंडन हमारे मूल जाँभाणी दर्शन के सरासर विरुद्ध है!

यह ब्राह्मणत्व द्वारा अपने *वर्चस्व  और आमजन के  बौद्धिक-बधियाकरण* के जरिये अपने *शोषक सांस्कृतिक_टूलकिट* को थोपने का *प्रतिनिधि उदाहरण* है!  

क्या  यह गुरु महाराज का चरित्र हनन नहीं है कि  जो गुरु महाराज ब्राह्मणत्व को  "लादण से भी बुरा "  कहते हैं; और इधर वही परशुराम की जरिये क्षत्रिय_संहार और क्षत्रिय-स्त्रियों के गर्भ तक को गिराने वाले हिंसक कुकृत्य को आदर्श के रूप में भी स्थापित करते हैं!

यह गुरु महाराज के *अहिंसक दर्शन पर आतंकी-ब्राह्मणत्व की 'लदाई' है! यह सरासर गुरु महाराज का चरित्र-हनन है! 

श्री चूनारामजी तो क्षत्रियों को राक्षस घोषित कर उनके भ्रूण तक का सांस्कृतिक_शोधन करने की दलील देते हैं!
तब क्षत्रियों को  "साधने " के लिए कलम या शब्द के बजाय, परशु का प्रयोग क्यों किया गया था ?

क्या गुरु महाराज ने  हमें भी "किसी शस्त्र " से प्रबोधित किया था ? 

क्या हमारी *शब्दवाणी* कोई    *शस्त्रवाणी* है ?

यह जानते-बूझते कि *हमारी शब्दवाणी  नाथोजी, रेड़ोजी आदि हजूरी शिष्यों  की स्मृतियों के आधार पर कालांतर में संकलित की गई थी;*  फिर भी हम वर्तमान  शब्दवाणी को  गुरु महाराज का *डायरेक्ट डिक्टेशन* मान रहे हैं! उसमें किसी दूसरे की *पसंद के  प्रक्षेपण* को मानने के लिए तैयार नहीं है!
जबकि शब्दवाणी सहित  पूरा जाँभाणी-दर्शन जरूरतों के अनुसार  "विकसित " होता रहा है !

ऊदोजी नैण* गुरु महाराज के समकालीन माने जाते हैं ! उनके 5 छप्पयों में  वर्णित *एह धर्म विष्णुइयाँ तणाँ* के समुच्चय में करीब  *37 नियम हैं और  वर्तमान   29 नियमों की तुलना में 17 नियम अलग हैं; विशेषकर नील-निषेध तो है ही नहीं!

तब ऊदो नैण  "ऐसा गुरुद्रोह "  कैसे कर सकते थे; कि जिस  "नील-निषेध " को खुद गुरु महाराज ने प्रस्तावित किया हो और वे उसे अनदेखा करने की अक्षम्य अवज्ञा कर दें!

यह समाज के लिए *विचारणीय  सवाल है!

सभी मानते हैं कि   *स्वामी  ईश्वरानंदगिरी  उत्तरकाशी में  जगतगुरु आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित  "परमहंस सन्यास "  की दीक्षा देते थे!* *जिन्होंने ही  शब्दवाणी में गायत्री आदि वैदिक-मंत्र जोड़कर बिश्नोईत्व पर ब्राह्मणत्व सवार कर दिया था!

क्रांतिकारी बदलाव  का शंखनाद तो केवल गुरु महाराज ने ही किया था ; जिन्होंने विरोध के पन्ने पर बड़ी सच्चाइयाँ दर्ज की थीं!  लेकिन बाद के साधे-भक्तों ने उन सच्चाइयों पर अपनी निजी सहूलियतें  सजा दीं!

 बदलती जरूरतों के तकाजों से* ऐसे  बदलाव हर  धर्म  में होते आए हैं! 

वैदिक धर्म में भी *यागादि: एव धर्म:
 ( सोमयाग, हविर्याग  : अश्वमेध, नरमेध ,ज्योतिष्टोम  आदि का अनुष्ठान ही धर्म है!)
  
समय बदला ; तो वैदिक धर्म को भी *अपनी धर्म की परिभाषा* बदलनी पड़ गई!

 यह स्वीकार करना पड़ा कि
 *धर्म य: धारयेत्* ! 
यानी  *जो धारण किया जाए, वही धर्म है !

इसलिए *परशुराम प्रतिज्ञा* के तहत घोषित  *कथित क्षत्रिय-संहार का  हम समर्थन नहीं  कर सकते; फिर उसका महिमा-मंडन तो हरगिज नहीं!

किसी वर्ग विशेष को आज भी शस्त्र दिखाकर,  पेंडिंग 20 संहारों को कभी  भी अंजाम देने की धमकी देना* कितना और क्यों *जायज* है  ? 

आजादी सबको मिली है !

 तो क्या इसका मतलब यही है कि  *हमारे अतीत के जमीर के जागीरदार (ब्राह्मणत्व) सामाजिक-सौहार्द्र के दूध में  : जुलूसों  में परशु दिखाकर  नींबू निचोड़ते  रहें ?और हम बिश्नोई  भी उसका जयकारा करते हुए इठलाते रहें ? 

 क्या वे  अंध-अतीत  के जमीर के जागीरदार : आज के लोकतांत्रिक माहौल में भी अतीत की कल्पनाओं के जरिये दिये गये सांस्कृतिक-घावों को कुरेद कर,  उन पर नमक छिड़कने के मजे लूटते रहें ?

और क्या हम भी *उन लादण से बुरों* के फेवर में  *हूटिंग* करते रहें ?  *क्या हम अब भी परजीवी सनातन-संस्कृति की रक्षा के नाम पर आत्ममुग्ध होकर इठलाते  रहें ? 

 जिसको 550 साल पहले *छूट-पल्ला* दे
 चुके थे; उसके लिए  सालों-साल *सुवावड़،*  पहुंचाने जाना कैसी मर्दानगी है ? 

हम सभी जानते हैं कि शब्दवाणी का पहला शब्द *गुरु चीन्हो गुरु चीन्ह ۔۔۔  है ! और *बृहन्नवण* बाद के साधु-संतों द्वारा शामिल की गई स्तुति है !
जिसकी दूसरी पंक्ति है  *साधे भक्ति/ भक्ते ऊधरणों۔۔۔۔
 क्या यह मुंह बोलता  सबूत नहीं कि  साधों-भक्तों को यह मौका मिल गया कि वे विश्नोईजन को धर्मादेश के रूप में कह दें कि *साधों की भक्ति* से आपका उद्धार होगा ! जबकि कहना  तो यही चाहिए था कि
 *शब्दवाणीसु ऊधरणों / गुरु वचनेसु ऊधरणों! 

 जाहिर है कि भोग लिखने वाली  ~कलम ~ जिस किसी के हाथ लग जाती है ; वह ऐश्वर्य-भोग के पट्टे अपने ही नाम से जारी करता है !

ब्राह्मण कलमकारों ने भी यही किया और हमारे साधो-भक्तों, कवियों   ने भी यही किया!  गुरु महाराज ने  जिन शास्त्रों को  भरपूर हिकारत से थोथा कागळ-पौथा कहा; हमारे कवि साधो   साखी बना कर गाते हैं कि  *भागवत पूरो पुराण सुण्या ही साँसो मिटै!  

शब्दवाणी के मर्म को न समझने वाले 
साधे-भक्ते-कवियों ने ही  "हरियाणा की चिंधड़ " जैसे कांड कारित किये हैं!  जिसका  उकसावा देने वाले ये साधे- भक्ते और कवि   लोग ही हैं!
   
 जब कलम *ईश्वरानंद गिरी जैसों* के   हाथ लग गई ; *तो उन्होंने  शब्दवाणी में अपने  ब्राह्मणी मतलब के अंडे टपका दिये ! 

 मामला : साधों और भक्तों के ही बीच का है; हम तो पढ़-लिख कर बिगड़े हुए लोग हैं!  यही न ?

 जाँभाणी-मनीषा और शब्दवाणी की इबारतों में साधों के डैरे और भक्तों की दंडवत प्रणाम के बिंब ही सजे हुए हैं!
  
साधुजन कान फूँक कर *सुगरा* करते हुए *क्रिया और करणी का  भेद बताते* हुए फरमा रहे हैं , कि *मूर्ख-भक्तों,  "हम जैसा करते "  हैं, वैसा नहीं;  बल्कि हम  "जैसा कहते " हैं, वैसा ही करो! क्यों साधोजी; जो आचरण  आप खुद भी कर सकते; वह हम सांसारिकों  के लिए क्यों प्रस्तावित कर रहे हो ?
  
एक आचार्यजी 15 साल से जिस गाँव में हरिकथा करने के बाद कुपढ-कुजाणी भक्तों को कोस रहे हैं कि *बिना तले की बाल्टी को भरकर मटका भरने की कितनी ही कोशिश करो; घड़ा कैसे भरेगा ?  

कोई उच्च शिक्षित भक्त भी अपने साधो  से  सवाल नहीं करता कि *महाराज, 15 साल  के उपदेशों के बाद आज आपने बाल्टियों के फूटे हुए तलों की खोज की है, तो आपने पहली हरिकथा से  ही उनका पैंदा रिपेयर करने का काम शुरू  क्यों नहीं किया ?  पैंदा रिपेयर करते या हम फूटी बाल्टियों को जोड़कर पाइप बनाने की  शुरुआत करते तो अब तक तालाब के तालाब भरे जा सकते थे!

सवाल कैसे करें, *गुरु का निंदणा* हो जायेगा; *राकसा-बोकसा बनकर पंथ को भाँजणे के दोषी बन जायेंगे!

 इस कोड़े का प्रबंध साधों ने खूबसूरती से कर रखा है; इसी कोड़े को फटकारने के लिए उसका पाठ दिलोजान से पूरे आरोह-अवरोह के साथ सधे हुए सुरुचिपूर्ण स्वर में करते हैं! 
क्योंकि मामला सिर्फ साधों और उनके भक्तों के बीच का है; शब्दवाणी और समाज का ही नहीं है !

यह आलोचना नहीं; बल्कि
 सामूहिक हित की *आवेदना* है! *साधों की इच्छा और उनके भक्तों की अनुरक्ति ही पिछले 400-500 साल से समाज की  "नियति " तय करती आ रही है!

विडंबना यह है कि इस ग्रुप के उच्च शिक्षित लोग भी उन्हीं साधो-भक्तों की व्याख्याओं को शब्दांतर से परोसते जा रहे हैं!

गुरु महाराज के प्रबोधन-कण साधो-भक्तों द्वारा मिलकर ढेर लगाये गये तुस (डूरे) में खो गये हैं!

कोई सवाल नहीं करता कि *रणधीर बाबल की वह सिलम कहाँ गई , जिससे मंदिर बनाया गया था ? 

खैराज भोमिया का इतना महिमामंडन किसलिए किया गया! इसके नमूने आज मिलते हैं; जब एक साधु महिलाओं को हड़का कर कहता है* कि *माहवारी की अवस्था में दर्पण  में मुंह देखने और बाल संवारने से फलाँ-फलाँ अनर्थ हो जायेंगे!

जबकि *महावारी तो निषेचन में असफल रहे गर्भाशय के आँसू हैं! इसे निशाने पर लेकर मातृत्व को जलील करने के बजाय; उसकी शिकार महिलाओं को शुचिता की सुविधा देते हुए आराम देने की जरूरत है! 

महिलाओं से यह वैर :  साधों की अपनी प्रॉब्लम है! ये तो अपने दाँत के दर्द का रोना रो रहे हैं; हम उसे हमदर्दी समझ रहे हैं!

जिन्हें  स्त्री-भोग सुविधा  का जुगाड़ न हो पाने के कारण उन्हें टोपी लेकर साधु बनना पड़ा था! शुरुआत में तो यही था ; आज धन और यश के लिए साधु बनने की पैराडाइम शिफ्ट हो गए हैं!

 इसके गूढ निहितार्थ को समझते हुए गृहस्थ ऋषि-मुनियों ने भी भोग-वंचित गृह-त्यागियों की मनोदशा को मनोवैज्ञानिक तरीके से चिह्नित करते हुए कहा है

अप्राप्ति: तत्र कारणम्!

(जो भोग : सांसारिक-भूमिका में नहीं मिला; उसे साधु की भूमिका में तलाश रहे हैं ! ) 

इसी कारण  सृजन की  आवश्यक शारीरिक  शर्त  के अंगूरों को *खट्टे अंगूर* कहकर जी भर कर कोसा जा रहा है !  

 (वैज्ञानिकता और शील  का)  *ज्ञान : एक खजाना है;  (उनका) अभ्यास : उसकी कुंजी है !

तब ये  शील की उदाहरण सहित व्याख्या और शील आयोजनपूर्वक अभ्यास क्यों नहीं कराते ? शील का अभ्यास ही : शीलवान बनने की चाबी है!

आचार्यों!बंद करो, ये बाल्टियों के फूटे पैंदों  के बहाने बनाना! 
 अपने *आचरण* से साबित करो कि   *हम गायणों की तरह गवैये नहीं है ; बल्कि  हम अपने  "आदर्श आचरण " से उपदेश करने वाले 'आचार्य " हैं!

आचरणाद् उपदेष्टति स आचार्य:! 

संकल्प लो कि *आदर्श आचरण की 'क्रिया' : पहले हम कमायेंगे ; फिर औरों को फरमाएंगे!
 
आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारी क्या मजबूरी है कि हम  गुरुवाणी के  पाखंड-विरोधी  उद्देश्यों को पहचानने के बजाय;    ~साधे भक्ते ऊधरणों ~  जैसे फरमानों को ही तरजीह देते जा रहे हैं  ?

गुरु महाराज द्वारा ब्राह्मणत्व के पाखंड का प्रचंड विरोध के बावजूद;  क्या अब भी हम  सनातनी अतीत के अंधकार की   ~ढोवणी~ करते हुए  "ब्राह्मणत्व के कावड़िया " बने रहेंगे ?
  
तब हम खैराज भोमिया, युधिष्ठिर ,हरिश्चंद्र، प्रहलाद की पाहल; बाराँ काजै आयो, परशुराम प्रतिज्ञा, गुरु का निंदणाँ, महावारी को अतिरंजित  भड़काऊ हौव्वा  बनाने, शब्दवाणी की भावना के विरुद्ध  नील-निषेध का जलालतपूर्ण फतवा    जैसे साधे-भक्तों  के मनमुखी फरमानों पर पुनर्विचार क्यों नहीं करते  ?

जो काम साधे-भक्ति कर रहे थे ; उसी को उच्च शिक्षित लोग भी  करते जा रहे हैं! तब  हमारे शिक्षित होने का समाज को क्या फायदा मिल रहा है?

क्यों नहीं हम *जुग जागो जुग जाग प्राणी काँय जागंता सोवो*  को *आधुनिकता के तकाजे  की बुलंद आवाज बनाते ?
  
क्यों नहीं, युवाओं के सुनहरे भविष्य के लिए,  साधे-भक्तों की भटकाने वाली पगडंडियों के बजाए ; शब्दवाणी को   "वैज्ञानिकता के राजमार्ग " की DPR घोषित करते ?

हमारे युवा 15-20 लाख की आबादी वाले बिश्नोई समाज को इजराइल-जापान   बनाने के लिए कसमसा रहे हैं ! और ये साधे-भक्तों की सनातन धर्म का  धतूरा चाटने वाली   टीम;. युवाओं की सहज संभावनाओं को क्षमताओं  के रूप में विकसित होने में अड़ंगे लगा रहे हैं! करणी और कथनी के बीच ३६ का आंकड़ा इन साधे-भक्तों  ने ही फँसाया है ! निर्लज्ज होकर फरमान जारी करते हैं कि हमारी  "करणी ? " पर मत जाओ, हमारी कथनी को मानो!

  करणी और कथनी के बीच ३६ का आंकड़ा फंसाने वाले ही    आज आमजन को बिना पेंदी की बाल्टी  और भटके हुए युवा कहकर कोस रहे हैं ! उल्टा चोर कोतवाल को डांटे !

हमारी औकात नहीं है कि मंचों पर विराजमान होकर समाज  अतीत के सनातनी-अंधकार में ठैलने वाले साधे-भक्तों को हटकार कहें कि  *अपने डेरे खाली करें; आपका समय गुजर गया है !

हमने तो रोशनी के लिए चिराग जलाए हैं; और इधर अंधेरे बुरा मान बैठे हैं !

अब ये अंधेरा भी रात भर का मेहमान है! युवा लोग मशाल जला चुके हैं !

सिंहासन खाली करो कि युवा आते हैं !

  लेखक : भंवरलाल सियाक अध्यापक जाम्बा
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