शब्दवाणी के बजाय; "साधे-भक्ते ऊधरणों " को ही तरजीह क्यों ?
समाज हित में भेजा-फ्राई करने वाला अभूतपूर्व साहसिक विवेचन
सुधिय बंधुओं,
परशुराम के अर्थ न मुआ* से संबंधित यह व्याख्या परंपरित व्याख्याओं का शब्दांतरण मात्र है!
जैसा आग्रह मैं पहले भी सविनय आग्रह कर चुका हूँ कि *शब्दवा़णी में परशुराम को (कलमकार ब्राह्मणों द्वारा) विष्णु का अवतार घोषित करना और उनके आतंकी चरित्र का महिमा-मंडन हमारे मूल जाँभाणी दर्शन के सरासर विरुद्ध है!
यह ब्राह्मणत्व द्वारा अपने *वर्चस्व और आमजन के बौद्धिक-बधियाकरण* के जरिये अपने *शोषक सांस्कृतिक_टूलकिट* को थोपने का *प्रतिनिधि उदाहरण* है!
क्या यह गुरु महाराज का चरित्र हनन नहीं है कि जो गुरु महाराज ब्राह्मणत्व को "लादण से भी बुरा " कहते हैं; और इधर वही परशुराम की जरिये क्षत्रिय_संहार और क्षत्रिय-स्त्रियों के गर्भ तक को गिराने वाले हिंसक कुकृत्य को आदर्श के रूप में भी स्थापित करते हैं!
यह गुरु महाराज के *अहिंसक दर्शन पर आतंकी-ब्राह्मणत्व की 'लदाई' है! यह सरासर गुरु महाराज का चरित्र-हनन है!
श्री चूनारामजी तो क्षत्रियों को राक्षस घोषित कर उनके भ्रूण तक का सांस्कृतिक_शोधन करने की दलील देते हैं!
तब क्षत्रियों को "साधने " के लिए कलम या शब्द के बजाय, परशु का प्रयोग क्यों किया गया था ?
क्या गुरु महाराज ने हमें भी "किसी शस्त्र " से प्रबोधित किया था ?
क्या हमारी *शब्दवाणी* कोई *शस्त्रवाणी* है ?
यह जानते-बूझते कि *हमारी शब्दवाणी नाथोजी, रेड़ोजी आदि हजूरी शिष्यों की स्मृतियों के आधार पर कालांतर में संकलित की गई थी;* फिर भी हम वर्तमान शब्दवाणी को गुरु महाराज का *डायरेक्ट डिक्टेशन* मान रहे हैं! उसमें किसी दूसरे की *पसंद के प्रक्षेपण* को मानने के लिए तैयार नहीं है!
जबकि शब्दवाणी सहित पूरा जाँभाणी-दर्शन जरूरतों के अनुसार "विकसित " होता रहा है !
ऊदोजी नैण* गुरु महाराज के समकालीन माने जाते हैं ! उनके 5 छप्पयों में वर्णित *एह धर्म विष्णुइयाँ तणाँ* के समुच्चय में करीब *37 नियम हैं और वर्तमान 29 नियमों की तुलना में 17 नियम अलग हैं; विशेषकर नील-निषेध तो है ही नहीं!
तब ऊदो नैण "ऐसा गुरुद्रोह " कैसे कर सकते थे; कि जिस "नील-निषेध " को खुद गुरु महाराज ने प्रस्तावित किया हो और वे उसे अनदेखा करने की अक्षम्य अवज्ञा कर दें!
यह समाज के लिए *विचारणीय सवाल है!
सभी मानते हैं कि *स्वामी ईश्वरानंदगिरी उत्तरकाशी में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित "परमहंस सन्यास " की दीक्षा देते थे!* *जिन्होंने ही शब्दवाणी में गायत्री आदि वैदिक-मंत्र जोड़कर बिश्नोईत्व पर ब्राह्मणत्व सवार कर दिया था!
क्रांतिकारी बदलाव का शंखनाद तो केवल गुरु महाराज ने ही किया था ; जिन्होंने विरोध के पन्ने पर बड़ी सच्चाइयाँ दर्ज की थीं! लेकिन बाद के साधे-भक्तों ने उन सच्चाइयों पर अपनी निजी सहूलियतें सजा दीं!
बदलती जरूरतों के तकाजों से* ऐसे बदलाव हर धर्म में होते आए हैं!
वैदिक धर्म में भी *यागादि: एव धर्म:
( सोमयाग, हविर्याग : अश्वमेध, नरमेध ,ज्योतिष्टोम आदि का अनुष्ठान ही धर्म है!)
समय बदला ; तो वैदिक धर्म को भी *अपनी धर्म की परिभाषा* बदलनी पड़ गई!
यह स्वीकार करना पड़ा कि
*धर्म य: धारयेत्* !
यानी *जो धारण किया जाए, वही धर्म है !
इसलिए *परशुराम प्रतिज्ञा* के तहत घोषित *कथित क्षत्रिय-संहार का हम समर्थन नहीं कर सकते; फिर उसका महिमा-मंडन तो हरगिज नहीं!
किसी वर्ग विशेष को आज भी शस्त्र दिखाकर, पेंडिंग 20 संहारों को कभी भी अंजाम देने की धमकी देना* कितना और क्यों *जायज* है ?
आजादी सबको मिली है !
तो क्या इसका मतलब यही है कि *हमारे अतीत के जमीर के जागीरदार (ब्राह्मणत्व) सामाजिक-सौहार्द्र के दूध में : जुलूसों में परशु दिखाकर नींबू निचोड़ते रहें ?और हम बिश्नोई भी उसका जयकारा करते हुए इठलाते रहें ?
क्या वे अंध-अतीत के जमीर के जागीरदार : आज के लोकतांत्रिक माहौल में भी अतीत की कल्पनाओं के जरिये दिये गये सांस्कृतिक-घावों को कुरेद कर, उन पर नमक छिड़कने के मजे लूटते रहें ?
और क्या हम भी *उन लादण से बुरों* के फेवर में *हूटिंग* करते रहें ? *क्या हम अब भी परजीवी सनातन-संस्कृति की रक्षा के नाम पर आत्ममुग्ध होकर इठलाते रहें ?
जिसको 550 साल पहले *छूट-पल्ला* दे
चुके थे; उसके लिए सालों-साल *सुवावड़،* पहुंचाने जाना कैसी मर्दानगी है ?
हम सभी जानते हैं कि शब्दवाणी का पहला शब्द *गुरु चीन्हो गुरु चीन्ह ۔۔۔ है ! और *बृहन्नवण* बाद के साधु-संतों द्वारा शामिल की गई स्तुति है !
जिसकी दूसरी पंक्ति है *साधे भक्ति/ भक्ते ऊधरणों۔۔۔۔
क्या यह मुंह बोलता सबूत नहीं कि साधों-भक्तों को यह मौका मिल गया कि वे विश्नोईजन को धर्मादेश के रूप में कह दें कि *साधों की भक्ति* से आपका उद्धार होगा ! जबकि कहना तो यही चाहिए था कि
*शब्दवाणीसु ऊधरणों / गुरु वचनेसु ऊधरणों!
जाहिर है कि भोग लिखने वाली ~कलम ~ जिस किसी के हाथ लग जाती है ; वह ऐश्वर्य-भोग के पट्टे अपने ही नाम से जारी करता है !
ब्राह्मण कलमकारों ने भी यही किया और हमारे साधो-भक्तों, कवियों ने भी यही किया! गुरु महाराज ने जिन शास्त्रों को भरपूर हिकारत से थोथा कागळ-पौथा कहा; हमारे कवि साधो साखी बना कर गाते हैं कि *भागवत पूरो पुराण सुण्या ही साँसो मिटै!
शब्दवाणी के मर्म को न समझने वाले
साधे-भक्ते-कवियों ने ही "हरियाणा की चिंधड़ " जैसे कांड कारित किये हैं! जिसका उकसावा देने वाले ये साधे- भक्ते और कवि लोग ही हैं!
जब कलम *ईश्वरानंद गिरी जैसों* के हाथ लग गई ; *तो उन्होंने शब्दवाणी में अपने ब्राह्मणी मतलब के अंडे टपका दिये !
मामला : साधों और भक्तों के ही बीच का है; हम तो पढ़-लिख कर बिगड़े हुए लोग हैं! यही न ?
जाँभाणी-मनीषा और शब्दवाणी की इबारतों में साधों के डैरे और भक्तों की दंडवत प्रणाम के बिंब ही सजे हुए हैं!
साधुजन कान फूँक कर *सुगरा* करते हुए *क्रिया और करणी का भेद बताते* हुए फरमा रहे हैं , कि *मूर्ख-भक्तों, "हम जैसा करते " हैं, वैसा नहीं; बल्कि हम "जैसा कहते " हैं, वैसा ही करो! क्यों साधोजी; जो आचरण आप खुद भी कर सकते; वह हम सांसारिकों के लिए क्यों प्रस्तावित कर रहे हो ?
एक आचार्यजी 15 साल से जिस गाँव में हरिकथा करने के बाद कुपढ-कुजाणी भक्तों को कोस रहे हैं कि *बिना तले की बाल्टी को भरकर मटका भरने की कितनी ही कोशिश करो; घड़ा कैसे भरेगा ?
कोई उच्च शिक्षित भक्त भी अपने साधो से सवाल नहीं करता कि *महाराज, 15 साल के उपदेशों के बाद आज आपने बाल्टियों के फूटे हुए तलों की खोज की है, तो आपने पहली हरिकथा से ही उनका पैंदा रिपेयर करने का काम शुरू क्यों नहीं किया ? पैंदा रिपेयर करते या हम फूटी बाल्टियों को जोड़कर पाइप बनाने की शुरुआत करते तो अब तक तालाब के तालाब भरे जा सकते थे!
सवाल कैसे करें, *गुरु का निंदणा* हो जायेगा; *राकसा-बोकसा बनकर पंथ को भाँजणे के दोषी बन जायेंगे!
इस कोड़े का प्रबंध साधों ने खूबसूरती से कर रखा है; इसी कोड़े को फटकारने के लिए उसका पाठ दिलोजान से पूरे आरोह-अवरोह के साथ सधे हुए सुरुचिपूर्ण स्वर में करते हैं!
क्योंकि मामला सिर्फ साधों और उनके भक्तों के बीच का है; शब्दवाणी और समाज का ही नहीं है !
यह आलोचना नहीं; बल्कि
सामूहिक हित की *आवेदना* है! *साधों की इच्छा और उनके भक्तों की अनुरक्ति ही पिछले 400-500 साल से समाज की "नियति " तय करती आ रही है!
विडंबना यह है कि इस ग्रुप के उच्च शिक्षित लोग भी उन्हीं साधो-भक्तों की व्याख्याओं को शब्दांतर से परोसते जा रहे हैं!
गुरु महाराज के प्रबोधन-कण साधो-भक्तों द्वारा मिलकर ढेर लगाये गये तुस (डूरे) में खो गये हैं!
कोई सवाल नहीं करता कि *रणधीर बाबल की वह सिलम कहाँ गई , जिससे मंदिर बनाया गया था ?
खैराज भोमिया का इतना महिमामंडन किसलिए किया गया! इसके नमूने आज मिलते हैं; जब एक साधु महिलाओं को हड़का कर कहता है* कि *माहवारी की अवस्था में दर्पण में मुंह देखने और बाल संवारने से फलाँ-फलाँ अनर्थ हो जायेंगे!
जबकि *महावारी तो निषेचन में असफल रहे गर्भाशय के आँसू हैं! इसे निशाने पर लेकर मातृत्व को जलील करने के बजाय; उसकी शिकार महिलाओं को शुचिता की सुविधा देते हुए आराम देने की जरूरत है!
महिलाओं से यह वैर : साधों की अपनी प्रॉब्लम है! ये तो अपने दाँत के दर्द का रोना रो रहे हैं; हम उसे हमदर्दी समझ रहे हैं!
जिन्हें स्त्री-भोग सुविधा का जुगाड़ न हो पाने के कारण उन्हें टोपी लेकर साधु बनना पड़ा था! शुरुआत में तो यही था ; आज धन और यश के लिए साधु बनने की पैराडाइम शिफ्ट हो गए हैं!
इसके गूढ निहितार्थ को समझते हुए गृहस्थ ऋषि-मुनियों ने भी भोग-वंचित गृह-त्यागियों की मनोदशा को मनोवैज्ञानिक तरीके से चिह्नित करते हुए कहा है
अप्राप्ति: तत्र कारणम्!
(जो भोग : सांसारिक-भूमिका में नहीं मिला; उसे साधु की भूमिका में तलाश रहे हैं ! )
इसी कारण सृजन की आवश्यक शारीरिक शर्त के अंगूरों को *खट्टे अंगूर* कहकर जी भर कर कोसा जा रहा है !
(वैज्ञानिकता और शील का) *ज्ञान : एक खजाना है; (उनका) अभ्यास : उसकी कुंजी है !
तब ये शील की उदाहरण सहित व्याख्या और शील आयोजनपूर्वक अभ्यास क्यों नहीं कराते ? शील का अभ्यास ही : शीलवान बनने की चाबी है!
आचार्यों!बंद करो, ये बाल्टियों के फूटे पैंदों के बहाने बनाना!
अपने *आचरण* से साबित करो कि *हम गायणों की तरह गवैये नहीं है ; बल्कि हम अपने "आदर्श आचरण " से उपदेश करने वाले 'आचार्य " हैं!
आचरणाद् उपदेष्टति स आचार्य:!
संकल्प लो कि *आदर्श आचरण की 'क्रिया' : पहले हम कमायेंगे ; फिर औरों को फरमाएंगे!
आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारी क्या मजबूरी है कि हम गुरुवाणी के पाखंड-विरोधी उद्देश्यों को पहचानने के बजाय; ~साधे भक्ते ऊधरणों ~ जैसे फरमानों को ही तरजीह देते जा रहे हैं ?
गुरु महाराज द्वारा ब्राह्मणत्व के पाखंड का प्रचंड विरोध के बावजूद; क्या अब भी हम सनातनी अतीत के अंधकार की ~ढोवणी~ करते हुए "ब्राह्मणत्व के कावड़िया " बने रहेंगे ?
तब हम खैराज भोमिया, युधिष्ठिर ,हरिश्चंद्र، प्रहलाद की पाहल; बाराँ काजै आयो, परशुराम प्रतिज्ञा, गुरु का निंदणाँ, महावारी को अतिरंजित भड़काऊ हौव्वा बनाने, शब्दवाणी की भावना के विरुद्ध नील-निषेध का जलालतपूर्ण फतवा जैसे साधे-भक्तों के मनमुखी फरमानों पर पुनर्विचार क्यों नहीं करते ?
जो काम साधे-भक्ति कर रहे थे ; उसी को उच्च शिक्षित लोग भी करते जा रहे हैं! तब हमारे शिक्षित होने का समाज को क्या फायदा मिल रहा है?
क्यों नहीं हम *जुग जागो जुग जाग प्राणी काँय जागंता सोवो* को *आधुनिकता के तकाजे की बुलंद आवाज बनाते ?
क्यों नहीं, युवाओं के सुनहरे भविष्य के लिए, साधे-भक्तों की भटकाने वाली पगडंडियों के बजाए ; शब्दवाणी को "वैज्ञानिकता के राजमार्ग " की DPR घोषित करते ?
हमारे युवा 15-20 लाख की आबादी वाले बिश्नोई समाज को इजराइल-जापान बनाने के लिए कसमसा रहे हैं ! और ये साधे-भक्तों की सनातन धर्म का धतूरा चाटने वाली टीम;. युवाओं की सहज संभावनाओं को क्षमताओं के रूप में विकसित होने में अड़ंगे लगा रहे हैं! करणी और कथनी के बीच ३६ का आंकड़ा इन साधे-भक्तों ने ही फँसाया है ! निर्लज्ज होकर फरमान जारी करते हैं कि हमारी "करणी ? " पर मत जाओ, हमारी कथनी को मानो!
करणी और कथनी के बीच ३६ का आंकड़ा फंसाने वाले ही आज आमजन को बिना पेंदी की बाल्टी और भटके हुए युवा कहकर कोस रहे हैं ! उल्टा चोर कोतवाल को डांटे !
हमारी औकात नहीं है कि मंचों पर विराजमान होकर समाज अतीत के सनातनी-अंधकार में ठैलने वाले साधे-भक्तों को हटकार कहें कि *अपने डेरे खाली करें; आपका समय गुजर गया है !
हमने तो रोशनी के लिए चिराग जलाए हैं; और इधर अंधेरे बुरा मान बैठे हैं !
अब ये अंधेरा भी रात भर का मेहमान है! युवा लोग मशाल जला चुके हैं !
सिंहासन खाली करो कि युवा आते हैं !
लेखक : भंवरलाल सियाक अध्यापक जाम्बा
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